Monday, December 18

मौसम ||

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बालों को सहलाती ये सर्द हवाएं ,
गुज़रे दिन की हसीन शाम है |
तपती दोपहरो में रोज़ कुछ पिघलते ,
उस गरीब की बेचैन रातो का आराम है |

झुलसते शहरों से दोस्ती निभाने ,
आज ये बहती दूर से आईं है |
वरना सूरज की तपिश ने चाँद के रस्ते ,
बेहाल ज़मीन को रातें भी जगाई है |

खिड़कियाँ खोल ऐसे अंदर चली आईं ,
जैसे कोई आया हो रूठे दोस्त को मनाने |
फिर मेरे सामने सोए पेड़ों के पास ,
मुरझाते पत्तों की हर जलन मिटाने |

चेहरों से दिन का संघर्ष पोछकर ,
ये बादलों को भी बुला लाई |
उन बादलों से सारा पानी लेकर,
प्यासी मिट्टी को हर कोने तक भिगा आई |

अगली सुबह खुशनुमा बनाकर,
फूलों को खिलने की वजह दे गई |
सूखती ज़िन्दगी की खबर मिलते ही,
फिर वो फ़िज़ाएं लाने का वादा कर गई |

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