Sunday, November 18

आख़िरी ख़त

Google+ Pinterest LinkedIn Tumblr +

तुम्हारा एक पुराना ख़त आज अलमारी के कोने में पड़ा मिला
धूल जमी हुई थी कुछ उस पर
हल्का सा झाड़ा और धूल हटी तो याद आया
वो तुम्हारा आख़िरी ख़त था मेरे नाम
जिसे मैंने आज तक पढ़ा ही नही
शायद इसीलिए के मुझे डर था
के मैं वो सच संभाल ना पाऊं
कांपती उँगलियों से धीरे धीरे खोला उसे और पहला लफ़्ज़ पढ़ा
तुमने अपनी एक नज़्म लिखी थी उसमें
जो कई बार मुझे, तुमने पहले सुनाई भी थी
एक एक हर्फ़ याद है मुझे उस नज़्म का आज भी
और जानती हो, मुद्दतों बाद भी ऐसा एहसास हुआ
जैसे तुम फिर से मेरे कानों उसे गन गुना रही हो
पहले कभी मैंने उसके अल्फ़ाज़ों पर ग़ौर नही फ़रमाया
पर आज लगा जैसे तुम हमेशा से मुझे कुछ कहना चाहती थी
मुझे कुछ बताना चाहती थी
जो कभी मैं समझ ही नही पाया
एक नही दो नही , ना जाने कितनी दफ़ा तुम्हारा ख़त पढ़ा
और कब चश्म-ए-तर से आबशार बहने लगा
कब शब ढली और कब मेहताब आसमान में अब्र संग लुका-छिपी खेलना लगा
और ना जाने कब वो ना खुलने वाली गहरी नींद आ गयी ।।

नitish

Share.

About Author

A Freelance Finance Professional. Writes whenever something good strikes. Have interests in altogether different fields ranging from Freehand Sketches and Poetry to Theatre, Music, Martial Arts (professionally trained) and not to forget “Train Spotting”. Though, not a people’s person, but still likes to meet a different array of strangers to have a different persective to life and hear out their story. A wanderer by heart who just wants to go on a life long solo trip around the world (“Longing for a place, I’ve never been to”) .

Leave A Reply