Saturday, August 18

शौर्य

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पठानकोट के धमाको से आंखे तो खुली होंगी,
गर अब भी हथेली मुट्ठी ना बनी तो ये बुजदिली होगी।
यकीन है की ऊंघती सरकारें जागेंगी इस शोर से,
कुछ देर ही सही इनकी कुर्सी तो हिली होगी।
हर चलते फिरते इंसा को ये लाश समझते हैं पर,
बहुत रोयी होगी माँ शहीद की जब खबर मिली होगी।
अकेला समझ ना लेना कोई सरहद पे खड़े जवान को,
जरूरत हुईं तो सभी की जान हथेली पर रखी मिली होगी।
जंग भी जरूरी है अमन की रखवाली के लिए वरना,
मुल्क के साये में सहमी चमन की हर कली होगी।
सौ सुनार कि तो एक लोहार कि याद रहे,
जब हम हिसाब लेंगे तो हर चोट कि वसूली होगी।
– अन्वय बरनवाल
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About Author

Being a person of finance by my profession, I have always been a person of literature by my heart be it writing or reading. Poetry for me is just an extension to extinguish the quest for deeper form of literature.

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